राम का नाम आज आडम्बरों के शोर से आच्छादित है। नीति, नीयत और निहितार्थ का विमर्श बेमानी है। जो मंदिर बन रहा है, वह दशरथ पुत्र राम का है। इसमें वाल्मीक, तुलसी, अनेकानेक भाष्यकारों के राम सिरे से गायब हैं।

सदियों से राम को जीवन और किताबों से निकाल कर मंदिरों में सजाया जाता रहा है। एक बार फिर वही सब हो रहा है। किसी ने पाँच सौ वर्ष पहले मन्दिर तोड़ा, किसी ने हजार साल बाद मंदिर बना दिया। क्या इससे राम के होने पर कोई फर्क पड़ा..? निश्चित ही नहीं..!

*राम थे। राम हैं। राम रहेंगे। वे जन जन का लोक गायन हैं। वे जीवन की हर धारा में प्रवाहमान हैं। वे मानव मात्र के सखा भाव हैं।* वाल्मीकी का सृजन हैं। वे तुलसी के आराध्य हैं।

हमारा दुर्भाग्य रहा कि हमनें रामायण या मानस को आँखे मूँदकर बाँचा। उसे जानने, समझने की अपेक्षा पूजने में स्वर्ग ढूंढते रहे। परिणामतः हम राम के वास्तविक रूप को कभी जान नहीं पाए। *वाल्मीकि या तुलसी को नकार कर हम राम को कभी जान भी नहीं सकते।

बहरहाल, वाल्मीकि या तुलसी के राम क्या हैं..? उनका राम राज्य क्या है..? इस पर एक नजर डाली जा सकती है।

कथा रूप में राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। एक महाग्रंथ का नायक प्रभु सदृश्य होकर भी पूर्णतः मानवीय है। अपने कर्मक्षेत्र में सुचिता और मर्यादा का मानक है।

राम के जन्म का कारण असुरों का नाश है। यहाँ असुर जाति या वर्ग नहीं है, अपितु अमानवीयता की प्रतीकात्मक संज्ञा है। तभी तो रावण और विभीषण भाई होते हुए भी अलग अलग हैं।

विश्वामित्र राम को बाल्यकाल में अपनी एवम अन्य ऋषियों की रक्षा के लिए ले जाते हैं। जबकि वे दशरथ या किसी दूसरे राजा से सीधी सैन्य- मदद मांग सकते थे। *विश्वमित्र शिक्षा और ज्ञान का प्रतीक हैं। वे जानते है शिक्षा और ज्ञान का रक्षण अबोध, निर्मल, शुद्ध शौर्य ही कर सकता है। सोने के मुकुट अग्नि में शस्त्र तपाता है, वह हवन-कुंडों में ज्ञान की ज्योति- ज्वाला नहीं जलने देता।* राम निर्जन वनों के तप को बचाते हैं। वे किसी राजा के सिहांसन का रक्षण नहीं करते।

राम, हर सुख, दुःख (राजतिलक और बनवास) में स्थितिप्रज्ञ नजर आते हैं। वे राजा दशरथ से कोई शिकायत नहीं करते। कैकई सर्वाधिक सम्मान देते हैं। भरत उनका सबसे प्रिय भाई है। द्वेष और वैमनस्य से उनका कोई परिचय नहीं है। काम, क्रोध, मोह, लोभ से अनाशक्त हैं। यहाँ राम स्नेह, सम्मान और सरोकारों के प्रतीक हैं।

वन मार्ग में केवट, सबरी, सहित वे हर छोटे बड़े प्राणी का मन जीत रहे हैं। सीता विरह में खग, मृग, है मधुकर श्रेणी से संवाद कर रहे हैं। जटायु, वानर, भालू, वन्य-प्रणियों के पालनहार बने हुए हैं। *वे किसी को तुच्छ नहीं मान रहे। अपितु तुच्छ को विराट का भाव देते हैं। वाल्मीक यहाँ राम के भक्त हनुमान को लघु से विराट और विराट से लघु बनाकर यही दिखाना चाहते हैं।*

राम रावण का युद्ध दो विलोम का युद्ध है। राम के रूप में त्याग, तपस्या, विनम्रता, सादगी, तेजस्विता,खड़ी है तो रावण के साथ समृद्धि, सत्ता, शक्ति, सामर्थ्य, अहंकार, अपराध, असत्य है। युद्ध का तात्कालिक कारण भी प्रेम और काम का शाश्वत द्वंद है।

रामायण की सीता स्त्री के समग्र मूल्यों को सींचती है। वह सृष्टि और सृजन के स तत्व लेकर धरती से जन्मती है। वह साहस और शौर्य का प्रतिमान बन शिव के विशालकाय धनुष को उठाकर एक ओर रख देती है। वह प्रेम, परिणय और परिवार के साथ कर्तव्य पथ की पगडंडी पर चलती है। वह शील, सौंदर्य, और शक्ति की त्रिवेणी रचती है। वह देह से इतर राम को राम बनाती है। *सीता पानी सा मन लेकर बहती है। अग्नि परीक्षाओं में उसके तेज के ताप से आग की लपटें सहम जाती हैं।*

ठीक इसी तरह रामायण के सारे दूसरे पात्र अपना वैशिष्ट लिए हुए हैं। उनसे जीवन, समाज और आर्दश के उच्च मूल्य संयोजित हैं। जिनका अनुसरण एक सभ्य और समृद्ध समाज रचता है। जिसे गांधी की भाषा में राम राज्य कहते हैं।

*राम महान राजा नहीं हैं।* प्रतापी, ऐतिहासिक, या चक्रवर्ती सम्राट भी नहीं हैं।

*राम तपस्वी राजा है। वे महलों की दीवारों पर किसी फ्रेम में सजे नहीं खड़े हैं। वे सूखी फूल पत्तियों वाली राहों में बिछे हैं। *वे अयोध्या से पलायन कर चित्रकूट और पंचवटी बसाते हैं। वे दशरथ या जनक के ऐश्वर्य से ज्यादा जंगलों-पर्वतों पर रहने वाले भोले-भाले जीवों पर यकीन करते हैं।* वे विकार, विद्रूपता और विकृति के विरुद्ध हर पल युद्धरत हैं। इसलिए उनके नाम को मोक्ष का द्वार माना जाता है।

*राम त्याग, तपस्या, करुणा, दया और दायित्व की सबसे बड़ी पाठशाला हैं। राम भजन है, नारा नहीं। राम मुस्कान है, अट्टहास नहीं। राम त्याग है, प्राप्ति नही। राम प्यार है, घृणा नहीं। राम समर्पण हैं, सम्मोहन नहीं। राम मन है,मंदिर नहीं। राम सर्वत्र है, उसका कोई धाम नहीं।*

*हमें अपने भीतर ढूंढना है कि हमारे राम कहाँ है..?*